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Thursday, 19 January 2017

विज्ञान-दृष्टि विहीन वैज्ञानिक



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विज्ञान-दृष्टि विहीन वैज्ञानिक
 पुष्प एम. भार्गव
भारत ने पिछले 85 सालों से विज्ञान में एक भी नोबेल पुरस्कार पैदा नहीं किया. इसका बड़ी वजह देश में वैज्ञानिक आबोहवा की गैरमौजूदगी है.

जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में 'साइंटिफिक टेम्पर' यानी वैज्ञानिक सोच (या विज्ञान दृष्टि) जुमला ईजाद किया था. यह पुस्तक 1946 में प्रकाशित हुई. वह एसोसिएशन ऑफ़ साइंटिफिक वर्कर्स ऑफ़ इंडिया (एएसडब्ल्यूआई) नाम की संस्था के अध्यक्ष भी थे. यह संस्था बतौर ट्रेड यूनियन पंजीकृत थी और 1940 दशक और 1950 के शुरूआती वर्षों में मैं भी इससे जुड़ा रहा. यह अपनी तरह का इकलौता उदाहरण होगा जब एक लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री किसी ट्रेड यूनियन का अध्यक्ष बना हो. संस्था के उद्देश्यों में एक था- वैज्ञानिक दृष्टि का प्रचार-प्रसार. शुरू में यह काफी सक्रिय रही लेकिन 1960 दशक आते-आते पूरी तरह बिखर गयी, क्योंकि देश के ज्यादातर वैज्ञानिक, जिनमें कई ऊंचे पदों पर आसीन थे, स्वयं वैज्ञानिक दृष्टि की उस अवधारणा के प्रति प्रतिबद्ध नहीं थे, जो तार्किकता व विवेक का पक्षपोषण तथा तमाम तरह की रूढ़ियों, अंधविश्वासों व झूठ से मुक्ति का आह्वान करती है.  
इससे निष्कर्ष निकलता है कि हमारे अपने वैज्ञानिक- जिन पर वैज्ञानिक चिंतन को आगे ले जाने का जिम्मा था, खुद वैज्ञानिक दृष्टि से जुदा थे. वे उतने ही अन्धविश्वासी थे जितना कोई भी गैर-वैज्ञानिक व्यक्ति हो सकता है. इस बात की पुष्टि 1964 की एक घटना से की जा सकती है. सतीश धवन (जो बाद में अंतरिक्ष विभाग के सचिव बने) के एक वक्तव्य पर अब्दुल रहमान (प्रख्यात विज्ञान इतिहासकार) और मैंने जनवरी 1964 में एक संस्था का गठन किया. द सोसाइटी ऑफ़ साइंटिफिक टेम्पर नाम से स्थापित इस संस्था के संस्थापक सदस्यों में नोबेल विजेता फ्रांसिस क्रिक जैसे नामचीन वैज्ञानिक भी शामिल थे. संस्था की सदस्यता के लिए निम्न वक्तव्य पर हस्ताक्षर करवाए जाते थे: "मैं मानता हूं कि ज्ञान एकमात्र मानव प्रयासों से ही प्राप्त किया जा सकता है, न कि किसी किस्म के दैवीय इलहाम से. और सभी तरह की समस्याओं का निराकरण हर हाल में मनुष्य के नैतिक व बौद्धिक संसाधनों से ही संभव है, न कि अलौकिक शक्तियों के आवाहन से."
हमें तब गहरा झटका लगा जब लगातार एक के बाद दूसरे वैज्ञानिक ने इस वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया. साफ़ था कि वे वैज्ञानिक दृष्टि से कोसों दूर थे. इस भ्रम के टूट जाने के बाद मैंने 1976 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री प्रो. नूरुल हसन को इस बात के लिए राजी करवाया कि 42वें संशोधन के जरिए संविधान की धारा 51अ में इन पक्तियों को जोड़ा जाय: "भारत के हर नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टि, मानवता और खोजवृत्ति व सुधार की भावना का विकास करे."
इस प्रयास से हमारे वैज्ञानिकों को जागना और वैज्ञानिक दृष्टि के प्रति अपने कर्त्तव्य का भान होना चाहिए था. लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस मामले में स्थिति 50-60 साल पहले के मुकाबले थोड़ी भी सुधर पाई है. आगे दिए गए तीन उदाहरणों से इस बात को समझा जा सकता है.
नाम मात्र का सुधार
पिछली भाजपा सरकार के दौरान, तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को एक परिपत्र जारीकर सभी विश्वविद्यालयों में ज्योतिष पर एक डिग्री कार्यक्रम शुरू करवाने का आदेश दिया. इसके लिए उन्होंने विशेष अनुदान की व्यवस्था करने का भी निर्देश दिया. मेरी सहयोगी चंदना चक्रबर्ती और मैंने मिलकर इस आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की. प्रशांत भूषण हमारे वकील थे. याचिका स्वीकार कर ली गयी लेकिन ज्योतिष में विश्वास की व्यापकता के चलते लगे हाथ खारिज भी हो गयी (जैसा कि अपेक्षित था), बावजूद इसके कि ज्योतिष पूरी तरह अवैज्ञानिक व अतार्किक है और इसकी काल्पनिकता को कई बार सिद्ध भी किया जा चुका है). यहां तक कि न्याय करने वाले भी इसके संक्रमण से मुक्त नहीं हैं. तब एक भी वैज्ञानिक हमारे समर्थन में आगे नहीं आया. न ही छः राष्ट्रीय विज्ञान अकादमियों में कोई, जिन पर हर वर्ष जनता की कमाई का अच्छा-ख़ासा हिस्सा खर्च होता है. इस लड़ाई को आर्थिक मदद करने वाले हमारे समर्थकों में सभी गैर-वैज्ञानिक बिरादरी से थे. आखिरकार, हमारी विज्ञान अकादमियों की इस विकलांगता और विज्ञान सम्बंधी सामाजिक समस्याओं पर उनकी घोर असंवेदनशीलता को देखते हुए 1993 में मैंने तीन अकादमियों की फैलोशिप से त्यागपत्र देन उचित समझा.
दूसरा उदाहरण हमारी छहों विज्ञान अकादमियों से जुड़े वैज्ञानिकों की उस घनघोर चुप्पी का है, जब पिछले वर्ष प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुंबई में वैज्ञानिकों के एक समूह को संबोधित करते हुए दावा किया था कि अंग प्रत्यारोपण प्राचीन भारत में भी किया जाता था. इसके लिए उन्होंने गणेश के मानवीय शरीर और हाथी के सर को उदाहरण के बतौर पेश किया. किसी ने भी इन दावों का खंडन करने की ज़रूरत महसूस नहीं की.
तीसरा उदाहरण इस माह की शुरुआत में संपन्न 102वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अंतर्गत "संस्कृत में प्राचीन विज्ञान" विषय पर आयोजित गोष्ठी का है. इस गोष्ठी में यह कहा गया कि भारत में 9000 वर्ष पहले (यानी हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो सभ्यताओं से कोई 4,500 साल पहले) भारी-भरकम (60 x 60 फीट; कुछ मामलों में तो 200 फीट लम्बे) विमान उड़ाए जाते थे. इतना ही नहीं, यह दावा भी किया गया कि हमारे पास मौजूदा राडारों से भी आगे के राडार थे. ये राडार इस सिद्धांत पर आधारित थे कि सभी जीवित व निर्जीव पदार्थ हर वक्त ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं. और बताया गया कि 21वीं सदी में, "अंतरभेदन के कारण विज्ञान और आध्यात्म का संगम संभव होगा. मुझे संदेह है कि किसी भी गंभीर बुद्धिजीवी ने ऐसे नियम के बारे में पढ़ा-सुना होगा, जिसका न कोई सर है न पैर. गोष्ठी में किये गए ये और ऐसे कई उटपटांग दावे प्राचीन एवं मध्कालीन भारत की अनेक वास्तविक वैज्ञानिक उपलब्धियों का मज़ाक उड़ाते प्रतीत होते हैं.
निरर्थक है अकादमियां
विज्ञान जगत में अगुवाई करने वाले हमारे नामी-गिरामी वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक अकादमियों में से किसी ने भी इन दावों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई. विज्ञान कांग्रेस को आयोजित करने वाले विशिष्ट वैज्ञानिक बेशक यह जानते थे कि उन्हें क्या कहना चाहिए लेकिन या तो वे खुद इन बातों पर विश्वास करते होंगे या राजनीतिक तौर पर इसके लिए तैयार किये गए होंगे. इसलिए यह भारतीय विज्ञान कांग्रेस की सालान जलसे को प्रतिबंधित कर देने का मजबूत मामला है (जैसा कि मैंने द हिन्दू के अपने पिछले आलेख "भारतीय विज्ञान कांग्रेस की बैठकों को क्यों बंद कर देना चाहिए" में कहा था- सितम्बर 30, 1997). या फिर इसका नामकरण भारतीय विज्ञान विरोधी कांग्रेस रख देना चाहिए.
जहां तक विज्ञान अकादमियों का सवाल है, भारतीय विज्ञान को कोई नुकसान पहुचाये बगैर इनका बिस्तर बांधा जा सकता है. भारत ने पिछले 85 सालों से विज्ञान के क्षेत्र में एक भी नोबेल पुरस्कार पैदा नहीं किया- इसकी बड़ी वजह देश में वैज्ञानिक आबोहवा की गैरमौजूदगी है, वैज्ञानिक दृष्टि जिसका एक अहम तत्व है.  
(पुष्प एम. भार्गव सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मोलेक्युलर बायोलॉजी, हैदराबाद के संस्थापक निदेशक
और सदर्न रीजनल सेंटर ऑफ़ काउन्सिल फॉर सोशिअल डेवेलपमेंट के अध्यक्ष हैं).
#अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

Friday, 9 December 2016

राहत-ए-जम-जम

राहत-ए-जम-जम
नक्कारखाना
फत्ते मियां भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह गिरते-हांफतेाीमार दोस्त छेदीलाल की चौखट पर जा धमके। कलेजा मुंह को आ रहा था लेकिनाात ही कुछ ऐसी थी। दूर से ही विपक्षी नेता की तरह चिल्लाए, छेदी ओ छेदी। लेोटा, तेरे तोाुरे दिन कट गए। खाट पर उकड़ूौठ छेदी फुसफुसाया, अरे कुछ उगल तो सही। फत्ते ढांढ़सांधाने के अंदाज मेंोला, सरकार ने सूखा राहत की घोषणा कर दी है।ास कभी भी यहां पहुंच सकती है। तेरा जिला सूखा घोषित हो गया है क्योंकि यहां 50 फीसदी से कमाारिश हुई है। सो तेरा तो जुगाड़ हो गया। फिर योगीाााा की तरह जोर की सांस खींचकरोला, लेकिन छेदी यार हमास 0.5 अंक से पिछड़ गए। ऊपर वाले को शायद यही मंजूर था।ास इत्ती सी कमाारिश होती तो थोड़ीाहुत राहत हमारी झोली में आ जाती। भाग्य अपना-अपना। आाारिश तो जात-पात, धर्म-कर्म या सरहद देखकर आती नहीं।
यह सुन छेदी को मानो करंट लग गया हो। राखी सावंत के अंदाज में भड़क उठा।ोला, राहत गई तेल लेने। यहां जान को अटकी है और तुझे मजाक सूझ रहा। अरे चारााचा नहीं।ोई फसल को सूखा गटक गया। दवाई तक के लाले हैं। तू तो ऐसे खुश हो रहा है जैसे रियलिटी शो के अभिनेता कि जंगल पहुंचे नहीं और मिल गए पचास लाख। सरकारी फरमार ही तो जारी हुआ है ना। आ देखना पहले स्टेट घोषणा करेगा। डीएम अधिकारियों को दौड़ाएगा। अधिकारी गांव-गांव दौरा कर रिपोर्ट लिखेंगे। रिपोर्ट स्टेट हेडक्र्वाटर जाएगी वहां से केंद्र।ौठकों का दौर चलेगा, पैसा रिलीज होगा फिर उसी चैनल से वापस आएगा। कितना और का पहुंचेगा यह तो पहुंचाने वाला भी नहीं जानता। ता तक तो मियां दिवाला निकल चुका होगा। और फत्ते मियां पिछले सूखे का मंजर तो देख चुके हो।ौंक एकाउंट के लिए 100 का नोट चाहिए और राहत का चेक आया था 17, 50 व 70 रुपए का।
सरकारानाने में की तिकड़म का गणित हमेशा नेता सही लगाते हैं लेकिन राहत के गणित में उनकी याददाश्त शायद घास चरने चली जाती है। जा संकट खुद पर आए तो संसद तक में जूते उछालने से नहीं चूकते। आ स्वाइन फ्लू को ही देख लो। अमीर कीाीमारी है सो सरकार सिर केाल दिन-रात टिटहरीान खड़ी है।ााढ़ और हर सालाारिश केााद ऐसे इलाकों में दिमागीाुखार और हैजे से कई सैकड़ा लोग औराच्चे मरते हैं उस पर कोई शोर-शरााा नहीं होता। लेकिन घाराओ नहीं दोस्त, हिसाा तो सभी को यहीं देना होता है।

पाकिस्‍तान का किसान

खेती के संकट से गुजर रहा पाक किसान

पाकिस्तान में भी डब्ल्यूटीओ के दबाव में खेती और किसान को खत्म करने का कुचक्र रचा जा रहा है

अनिल चौधरी
खेती-किसानी वास्तव में घाटे का सौदा साबित हो रहा है। इसकी अहम वजह है सरकारों की उपेक्षा। ऐसा नहीं कि ये हालात भारत या फिर किसी दूसरे राष्ट्र के हों बल्कि दुनियाभर के किसानों की हालत एक जैसी ही है। सबसे शक्ति संपन्न देश अमेरिका में भी हर साल खेती छोड़ने वाले किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में विकसित देशों के किसानों की दशा का अंदाजा सहज रूप से लगाया जा सकता है। पचास साल पहले यानि आज की तथाकथित औद्योगिक क्रांति से पहले किसी भी देश की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की एक चौथाई तक भागीदारी होती थी लेकिन वह धीरे-धीरे लगभग नगण्य होती जा रही है। किसान पिस रहा है। खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है। ऊपर से मल्टीनेशनल कंपनियां जीएम और हाईब्रिड सीड लेकर विकासशील देशों की खेती पर नजर गड़ाए हैं। परिणामतया किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं या फिर उसकी चपेट में हैं। पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान में तो किसानों के हालात और भी बदतर हो गए हैं। वहां के किसान संगठन आशांकित हैं कि समय रहते पाक किसानों को सरकार ने बचाने की रणनीति नहीं बनाई तो किसान तो मरेगा ही देश में भुखमरी की हालत पैदा हो जाएगी। दिसंबर के आखिरी सप्ताह में भारत के दौरे पर आए किसानों के एक सात सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल से पाकिस्तान की कृषि की हालत जानकर तो यही लगता है।
पाक प्रतिनिधिमंडल ने जो खुलासा किया वह बेहद चौंकाने वाला था। पाकिस्तान में आज भी 67 फीसदी आबादी देहात में रहती है जो खेती करती है या फिर खेती पर निर्भर है। पाक में 88 फीसदी स्मॉल फार्मर हैं और इनके पास मात्र 48 फीसदी जमीन है। बाकि 12 फीसदी किसानों या कहें धनकुबेरों के पास 52 फीसदी जमीन है। और ये वही धनकुबेर हैं जो देश की सत्ता चलाते हैं। यानि यही तथाकथित किसान और रजवाड़े कृषि नीति बनाते हैं। या यूं कहें कि इनकी वजह से ही आज तक किसानों के हितों के लिए कोई नीति ही नहीं बनाई गई। सोने पर सुहागा यह रहा कि गत वर्षों में डब्ल्यूटीओ के दबाव में पाक सरकार ने मझोले किसानों को बिजली, खाद, पानी आदि पर दी जाने वाली सब्सिडी भी खत्म कर दी। नतीजतन छोटे किसानों की कृषि में उपज लागत और बढ़ी और यह उसी अमेरिका के कहने पर किया गया जो अपने किसानों को खुलकर सब्सिडी दे रहा है।
खेती-किसानी की अनदेखी का ही नतीजा है कि पाकिस्तान में सन् 1995-98 तक बजट का 25 फीसदी हिस्सा खेती के लिए दिया जाता था और अब इसका हिस्सा घटकर मात्र 1.5 फीसदी ही रह गया है। सुनकर हैरत होती है कि सन् 2000 तक पाक की जीडीपी में खेती का योगदान 23 फीसदी था और अब यह घटकर मात्र 3 फीसदी तक सिमट गया है।
प्रतिनिधिमंडल ने इस बात का खुलासा किया कि वर्तमान हालात में किसानों को फसलों के दाम मिल नहीं रहे हैं। पानी की लगातार कमी होती जा रही है। हरित क्रांति के बाद बेतरतीब खेती करने से कैमिकल और कीटनाशकों के अंधाधुंध दोहन से जमीन की उत्पादकता को खत्म कर दिया है और इसी वजह से पैदावार कम हो गई है। जमीन में जलस्तर जो एक दशक पहले तक 35 फीट हुआ करता था अब 60 से 70 फीट तक जा पहुंचा है। देश के अधिकांश इलाकों में पानी के लिए टयूबवेल बनाने की हिम्मत आम किसान में नहीं है। टयूबवेल लगा भी ले तो उसका बिजली का बिल ही 60 से 70 हजार रुपए महीना बैठता है जो एक  बड़े किसान के बस से भी बाहर की बात है। ऐसी स्थिति में वहां की सरकार नहरों का नीजिकरण कर रही है और ऐसा  हुआ तो किसान की हालत और बिगड़ेगी क्योंकि नीजि कंपनियों के हाथ में पानी चले जाने से किसान सिंचाई का मूल्य ही चुकाने की स्थिति में नहीं होगा। यही नहीं भारत के मुकाबले आकलन किया जाए तो पेट्रोल और डीजल के दाम भी वहां काफी ज्यादा यानि 57 रुपए प्रति लीटर हैं। ऐसे में किसान डीजल पंप की भी हिम्मत नहीं जुटा सकता।
यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आजादी के बाद से दो बार जमीन सुधार किया गया। पहली बार अय्यूब खां के दौर में और दूसरा जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर में लेकिन उसका पाकिस्तान के अवाम पर व्यापक असर नहीं दिखाई दिया। हालात ये रहे कि इतना सब होने के बाद भी मात्र 12 फीसदी कृषि भूमि की ही चकबंदी हुई और बाकी जागीरदारों व रसूकदारों के कब्जे में ही रही। पाकिस्तान में मौजूदा समय में भी दो सबसे बड़े सियासतदारों जुल्फिकार अली भुट्टो और फारूक अहमद लग्गारी के पास खेती की जमीन है। वहीं मिर्जाफरउल्ला जमाली, सिंध में गुलाम मुस्तफा जतोई ऐसे सियासतदां हैं जिनका आधी से भी अधिक खेती पर कब्जा है। इन्हीं भूमाफियाओं की वजह से पाकिस्तान में आजादी के बाद से असली किसान को हक नहीं मिल पाया और न ही वह इन सियासतदारों के सामने अपनी जबान ही खोल पाए क्योंकि लोकतांत्रिक सरकार का कभी पाक में वजूद ही नहीं रहा और मिलिट्री हुकूमत से टक्कर लेने की हैसीयत में किसान कभी रहा नहीं। कभी उनको संगठित भी नहीं होने दिया गया।
खेती का एक स्याह चेहरा डब्ल्यूटीओ पर दस्तखत करने के बाद से भी उभर रहा है जिसने किसानों को बेचैन कर रखा है और इसीलिए वह बाहर निकल किसानों के संगठनों में शामिल होने की छटपटाहट में भी है। किसानों ने खुलासा किया कि मल्टीनेशनल को छूट दी जा रही है और हाईब्रिड सीड व जीएम सीड के नाम पर किसानों को महंगे दामों पर बीज बेचने का हरसंभव प्रयास किया जा रहा है। मगर किसानों का तजुर्बा यह रहा है कि ऐसे बीजों की पैदावार आम बीज के मुकाबले कम है जबकि महंगे बीज के साथ ही उन पर ज्यादा मेहनत करने के साथ ज्यादा खाद-पानी और स्प्रे का बोझ बढ़ गया है। मुकामी (परंपरागत) बीजों को आहिस्ता-आहिस्ता बाजार से गायब किया जा रहा है और पिछले चार सालों से यह सिलसिला चल रहा है। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि बीटी काटन की खेती को सरकार ने अभी मंजूरी नहीं दी है लेकिन चोरी-छिपे इसकी खेती बड़ी मात्रा में की जा रही है और उम्मीद है कि सरकार शीघ्र ही इस कंपनी को यहां इजाजत देने जा रही है। जबकि बीटी काटन की खेती के दुष्परिणाम भारत समेत अन्य देश भी बेहतर देख चुके हैं। पहले बीटी काटन के बारे में स्टडी प्रकाशित की गई कि 28 किग्रा प्रति एकड़ में कीटनाशक का छिड़काव किया जाता था लेकिन बीटी के बीज से यह मात्र पहले साल में 14 किग्रा प्रति एकड़ हो गया और दूसरे साल 7 किग्रा रहा गया लेकिन तीसरे साल में यह फिर से 28 किग्रा प्रति एकड़ जा पहुंचा। चीन की रिपोर्ट ही इस बात का खुलासा करती है कि वहां इस बीज से खेती को नुकसान हुआ। किसान संगठनों की चिंता है कि 1960 में बीटी काटन के बीज में 5-7 कीड़े थे और अब दो दर्जन से अधिक हो गए हैं। पाकिस्तान काटन का चौथा बड़ा एक्सपोर्टर देश है जहां पर मल्टीनेशनल्स की नजर लगी हुई हैं। गत वर्ष पाक ने एक बिलीयन डालर की कॉटन का एक्सपोर्ट किया। चूंकि खेती लायक सिंध में सबसे बेहतर जमीन है इसलिए वहां पर 60 से 70 फीसदी कॉटन की खेती बीटी के बीज से चोर दरवाजे से की जा रही है। किसानों को फायदा गिना बरगलाया जा रहा है। अब तो यह भी स्पष्ट हो चुका है कि बीज पर जिसका अधिकार होगा फूड चेन पर भी उसी कंपनी का अधिकार होगा इसीलिए ऐनकेन प्रकारेण तमाम मल्टीनेशनल्स कंपनियों की निगाहें तीसरी दुनिया के देशों की खेती पर टिकी हुई हैं। जबकि शक्ति संपन्न अमेरिका की बात करें तो वहां 2002 में 9 लाख किसान थे और दो साल में ही दो लाख किसान खेती से बाहर हो गए। आंकड़े बता रहे हैं कि यूरोप में हर मिनट एक किसान खेती छोड़ रहा है। यह खतरनाक खेल मल्टीनेशनल कंपनी ही खेल रही हैं। खेती को घाटे का सौदा बता उस पर एकाधिकार पाने की जद्दोजहद में ये कंपनियां लगी हैं और विकासशील देशों की सरकारें इनके सामने घुटने टेकने को मजबूर हो रही हैं।
यही वे तमाम कारण है जिससे पाकिस्तान का किसान बेहद डरा हुआ है। पाकिस्तान किसान इत्तेहाद ने पाक में विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही स्वयं सेवी संस्थाओं खासकर किसान संगठनों को एकजुट करने का काम किया है। साथ ही दुनियाभर के दूसरे मुल्कों के किसान संगठनों से मिलकर खेती-किसानी को बचाने का बीड़ा उठाया है। इस संगठन के बैनर तले इस समय पचास से भी अधिक किसानों के संगठन अपनी आवाज को बुलंद कर रहे हैं। पाकिस्तान किसान इत्तेहाद के अध्यक्ष तारिक महमूद चौधरी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि अमेरिका परस्त नीतियों के सामने पाक सरकार घुटने टेक रही है और डब्ल्यूटीओ पर हस्ताक्षर करने के बाद मल्टीनेशनल कंपनियों की पॉलिसी खेती के क्षेत्र में भी लागू करने पर आमादा है जिसका पुरजोर विरोध करने के साथ ही वहां के किसानों को इसके नफा-नुकसान की जानकारी दी जा रही है। तारिक महमूद इस बात से भी काफी परेशान दिखे कि पाक की सरकार खेती से नियंत्रण हटा उसको नीजि हाथों में सौंपने की तैयारी में है। काटन और बासमती चावल में पाक का कोई सानी नहीं है इसीलिए मल्टीनेशनल इस खेती पर गिद्धदृष्टि लगाए हैं जिसका हम पुरजोर विरोध कर रहे हैं। उन्होंने आशा जताई कि दूसरे मुल्कों खासकर हिन्दुस्तान के किसान संगठनों से बात कर उन्हें संबल ही नहीं मिला बल्कि इस कुचक्र से बचने का मूलमंत्र भी मिला है। इसके लिए एशिया के सभी किसान संगठनों के साथ मिलकर वह विकसित देशों के खेती को चौपट करने वाले षड़यंत्र के खिलाफ आवाल बुलंद करेंगे। साथ ही किसानों को भी ताकीद करने का काम करेंगे ताकि समय रहते जल-जंगल और जमीन को बचाया जा सके।
जाहिर है ऐसे में दुनियाभर के किसानों व किसान संगठनों को इस मुसीबत का सामना करने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत रणनीति बनानी ही होगी वरना न खेत बचेंगे न खेती और न ही किसान और पाकिस्तान के किसान संगठन भी इसके लिए कमर कसते दिख रहे हैं। (जनवरी 2009 को पाकिस्तान से आए किसान प्रतिनिधिमंडल से बातचीतके आधार पर तैयार लेख )


Saturday, 3 December 2016

महिला किसान अौर मीडिया

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रिसर्च जनरल में प्रकाशित रिसर्च पेपर

Friday, 27 September 2013

मीडिया और किसान

बाजार में खड़ा मीडिया और किसान सरोकार

अनिल चौधरी
विश्व बिरादरी में भारत की पहचान मूलत: एक कृषि प्रधान देश की रही है। 21वीं सदी में नई औद्योगिक शक्ति के बतौर भारत के उदय के जोरदार दावों के बावजूद देश की ज्यादातर आबादी आज भी गांवों में कृषि या अन्य सहायक क्रियाकलापों से गुजर-बसर करती है। आजादी के 60 वर्षों के बाद भी भारतीय बस्तियां पश्चिमी देशों जैसी बुनियादी सुविधाओं व नागरिक चेतना से वंचित है। गांवों का तो और भी बुरा हाल है। यहां एकाधिक कारणों से आर्थिक ढांचा क्षत-विक्षत हुआ है तो सामाजिक बुनावट के भी रेशे बिखर गए हैं। शहरी व ग्रामीण इलाकों, शहरियों व देहातियों, संपन्न व वंचितों तथा अभिजन व आदिवासियों के बीच खाई और चौड़ी हुई है। लोकतंत्र की अर्थवत्ता इस खाई को पाटने से है लेकिन संसदीय लोकतंत्र के आधी सदी से भी ज्यादा के हमारे अनुभवों का निष्कर्ष इसके विपरीत जाता प्रतीत होता है। खास तौर पर पिछली सदी के आखिरी दशक में शुरू हुआ आर्थिक उदारीकरण व भूमंडलीकरण सामाजिक रूप से विघटनकारी साबित हुआ। इसने समर्थों को और शक्ति प्रदान की किन्तु वंचितों को पहले से ज्यादा कमजोर बना दिया। अमीरों व गरीबों के बीच फासला अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह पिछड़ गई और देश का पेट भरने वाले किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या करने को मजूबर हुए। उदारीकरण के परिणामस्वरूप लोकतंत्र को मजूबती देने वाले स्वर या तो मंद पड़ गए या उन्होंने कोई और राग अलापना शुरू कर दिया।
आज नकदी फसलों और अनाज उत्पादन, दोनों ही मोर्चों पर किसान शोषण का शिकार है। उन्हें न तो कपास व गन्ने का उचित मूल्य मिलता है और न ही धान, जवार, गेहूं या अन्य नकदी फसलों का। भूमंडलीकरण के बाद, जब किसानों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता के बीच ज्यादा सब्सिडी और संरक्षण की जरूरत थी, उन्हें भ्रष्ट सहकारी बैंकों व साहूकारों के रहमोकरम पर असहाय छोड़ दिया गया। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जहां देश के बड़े औद्योगिक समूह सब्सिडी सहित अरबों रुपयों के ऋण आसानी से हासिल कर लेते हैं, वहीं किसानों को अपनी फसलों हेतु मामूली रकम के लिए भी एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है। उद्योगपतियों का विशेष रियायतों के बावजूद ऋण हजम कर जाने पर भी बाल बांका नहीं होता, किसान मामूली किश्त अदा न कर पाने के कारण हवालात में ठूंस दिए जाते हैं या खेत नीलाम कर दिए जाते हैं। घाटे और कर्ज में डूबे देश के कई हिस्सों के किसान इन परिस्थितियों में खुद को असहाय पाकर बड़ी संख्या में आत्महत्या करने को विवश हुए हैं और यह क्रम बदस्तूर जारी है।
परंपरागत रूप से मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। लेकिन आर्थिक उदारवाद के मौजूदा दौर में वैश्विक रूप से पत्रकारिता की [चाहे वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक यह परिभाषा अपने अर्थ खो रही है। एक जमाने में पत्रकारिता एक मिशन मानी जाती थी। समाचार माध्यमों से सत्ता-प्रतिष्ठान के बजाय विपक्ष की भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती थी। इस भूमिका में खरे उतरने वाले पत्रकार अपनी विपन्नता के बावजूद समाज में इज्जत पाते थे। पिछले दो दशकों में तेजी से बदले सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में आज पत्रकारिता एक मुनाफेदार कारोबार का स्वरूप ग्रहण कर चुकी है। भारत में आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण की बयार ने मानव गतिविधियों की तमाम किस्मों का आंतरिक कायान्तरण किया। पत्र, पत्रकारिता और पत्रकार भी इससे अछूते नहीं रहे।
उन्नीस सौ नब्बे के दशक के बाद देशभर में समाचार माध्यमों का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। इस दरम्यान अंग्रेजी अखबारों का वर्चस्व टूटा और भाषाई अखबारों के साथ-साथ टीवी पत्रकारिता ने सफलता के आश्चर्यजनक कीर्तिमान स्थापित किए। देशभर में साक्षरता दर में हुई बढ़ोतरी के सुपरिणाम निकलने शुरू हुए और पत्र-पत्रिकाएं शहरों-कस्बों की सीमाएं लांघ दूर देहातों तक अपनी पैठ बनाने में कामयाब हुईं। राष्ट्रीय अखबारों के जिला स्तरीय संस्करण निकलने लगे और संवाददाताओं को विज्ञापन जुटाने का दायित्व सौंपा जाने लगा। इसके साथ-साथ निजी टेलीविजन चैनलों को खबरों के प्रसारण की इजाजत के बाद पैदा हुई खबरिया चैनलों की बाढ़ ने तो मीडिया को एक कमाऊ इंडस्ट्री में तब्दील कर दिया। समाचार माध्यम आम जन तक उपभोक्ता सामग्रियों के प्रचार को पहुंचाने का प्रमुख जरिया बन गए। भारी लागत मूल्य वाले अखबार को सस्ती कीमत में बेचकर भी अखबार मालिक विज्ञापनों की बदौलत भारी मुनाफा कमाने की स्थिति में आ गए।
आज मुख्यधारा की पत्रकारिता पूरी तरह बाजार के नियंत्रण में है। दूसरे उपभोक्ता उत्पादों की तरह ‘खबर’ को भी एक उत्पाद समझा जाता है और इसे ‘बेचने’ और मुनाफेदार बनाने के लिए मार्केटिंग के नुस्खों का इस्तेमाल किया जाता है। परिणामस्वरूप किसी जमाने में स्वायत्त हैसियत रखने वाले पत्रकार अब बाजार प्रबंधकों के निर्देशों से संचालित होते हैं और खबरों के चयन में ‘व्यावसायिक हित’ निर्णायक भूमिका निभाने लगे हैं। ऐसे में देश की बड़ी आबादी, जो दुर्भाग्यवश गरीब भी है, के सरोकार मीडिया की सुर्खियों में हाशिए पर धकेलने का सिलसिला चल निकला है। बीते एक दशक में आर्थिक तंगी के कारण लाखों किसानों के आत्महत्या कर लेने की दर्दनाक कहानियां मीडिया इंडस्ट्री में मनोरंजक खबरों के बीच दम तोड़ गईं। इसी तरह विशेष आर्थिक क्षेत्रों की खातिर उजड़े किसान, जीएम फसलों का मकड़जाल, बाजार के इशारे पर बदलता भूमि उपयोग, गांवों में बुनियादी सुविधाओं की बदहाली, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, दलित-महिला उत्पीड़न आदि मुद्दे सामान्यतया चटपटी खबरों की रेलमपेल में पीछे छूट गए हैं। टीवी के लिए भी किसानों की आत्महत्या की खबर एक चटखारे अंदाज में जगह पाईं या फिर उसको राजनीति से जोड़कर समूचा परिदृश्य ही बदल दिया गया। ग्रामीण विकास की अवधारणा को ही उलट-पुलट करने का काम इस दौर में मीडिया खासकर टीवी ने बड़ी बेरहमी के साथ किया। शहरीकरण की अंधीदौड़ से शहरों में फैली अराजकता को तो मीडिया ने कवरेज का मुख्य बिंदू माना लेकिन उसके कारणों की पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाई गई। कभी भी गांवों की उस खिड़की में झांकने की जहमत टीवी पत्रकारों ने उठाना गवारा नहीं समझा जहां मूलभूत सुविधाएं सिरे से अभी भी गायब हैं, और हैं भी तो भ्रष्टाचार की बेल ने उनको इस कदर जकड़ा कि उसका बीस फीसदी से अधिक वहां तक पहुंच ही नहीं पाया। यह भी देखना गवारा नहीं किया गया या किया जा रहा कि देश का पेट पालने वाली अस्सी फीसदी जनता के पास क्या है, क्या दिया गया और उसका हश्र क्या हुआ। हां , इतना अवश्य होता है कि जब कोई बड़ा नेता राहुल गांधी सरीखा किसी झोपड़ी में रात बिताता है तो वह खबर समूचे दिन सुर्खियों में रहती है और एक गरीब परिवार को टीवी के जरिए बेचने का काम किया जाता है।
गलती मीडिया की कैसे मानी जाए, दरअसल ग्रामीण परिवेश से जुड़े मीडियाकर्मियों का घोर अकाल भी है या दूसरे शब्दों में कहें गांव से जुड़ी खबरों के लिए स्थान ही नहीं है। जिसको लौकी की बेल या पेड़ का फर्क नहीं मालूम और जिसको शुगर की क्यूब बनने के पीछे की पीड़ा पता ही नहीं उससे कैसे हम किसानों के दुख-दर्द या गुड़ की सोंधी महक के उजागर करने की कल्पना कर सकते हैं।
लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि रेडियो और दूरदर्शन को पापुलर बनाने के पीछे इसी ग्रामीण जनता का ही हाथ है। यही वजह है कि अब चाहे वह पत्र-पत्रिकाएं हों, दूरदर्शन हो, रेडियो हो या फिर निजी चैनल गांवों को टारगेट कर रहे हैं। रेडियो के स्टेशन अब गांवों में खोलने की कवायद की जा रही है। गांवों में कालसेंटर स्थापित करने के पीछे भी वहां पर सस्ते श्रम की गणित बिठाई जा रही है। अब वह दौर है जब खाद्यान्न संकट की खबरों ने सबको हिलाया है और इराक-इरान जैसे रेगिस्तानों के देश में शेख खेती करने की वकालत कर रहे हैं। निजीकरण के चलते उपजी भयावह मंदी की तस्वीर किसी से छिपी नहीं है। इस बात को सीएसीपी के पूर्व चेयरमैन डॉ. टी हक भी मानते हैं कि भारत की सुदृढ़ कृषि अर्थव्यवस्था ने ही मंदी की मार से बचाया। लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि खेती-किसानी को विज्ञापनदाता न होने की वजह से हाशिए पर धकेलने का काम किया गया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अब खेती की अनदेखी करने वाले मीडिया को उसकी कीमत चुकानी होगी। और शायद यही वजह है कि प्रसार व प्रसारण बढ़ाने के लिए अब क्षेत्रीय संस्करणों व स्थानीय चैनलों की लंबी दौड़ दिखाई दे रही है।
पत्रकारिता आज कई स्तरों पर संक्रमण के दौर से गुजर रही है। पहला, संक्रमण इसकी बुनियादी पहचान का है। पत्रकारिता के गुरु बिल कोवाच के शब्दों में, ‘पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को ऐसी सूचनाएं उपलब्ध कराना है, जिसकी मदद से वे स्वतंत्र चेता और स्वशासित बन सकें।’ लेकिन पत्रकारिता के इस सिद्धांत को बाजार अर्थव्यवस्था की ओर से चुनौती मिल रही है। टेक्नोलॉजी नए आर्थिक संगठनों और सूचना संस्थानों को जन्म दे रही है, जो पत्रकारिता के चरित्र को भीतर ही भीतर बदल रहे हैं। आज स्वतंत्र पत्रकारिता को सरकारी सेंसर से उतना डर नहीं, जितना कि कारोबारी हस्तक्षेप से है। क्या लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के अपने प्राथमिक कार्यभार को तिलांजलि दे यह एक मुनाफेदार करोबार तक सिमट कर रह जाएगी? क्या मीडिया की भूमिका बाजार के संदेशवाहक मात्र की रह जाएगी? क्या सिर्फ मोटी जेब वाले उपभोक्ता वर्ग तक ही इसका सरोकार रहेगा और बाजार से बाहर छूट गया किन्तु आर्थिक रूप से विपन्न वृहत्तर समाज इसकी चिंताओं से बाहर हो जाएगा? सत्ता-प्रतिष्ठान के बजाय विपक्ष की भूमिका को छोड़ क्या पत्रकारिता सत्ता की निरंकुशता को वैधता प्रदान करने और उपभोक्तावादी मानसिकता को आगे बढ़ाने का जरिया मात्र रह जाएगी?
उपरोक्त प्रश्न पत्रकारिता के चरित्र एवं भविष्य के बारे में विचार करने की जरूरत को रेखांकित करते हैं। इन प्रश्नों से जुड़े अलग-अलग आयामों पर बुद्धिजीवियों ने अवश्य विचार किया है लेकिन इन्हें समग्र रूप से सोचा जाना चाहिए और इसकी पड़ताल कर निष्कर्षों पर भी पहुंचा जाना चाहिए। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि लोकतंत्र सिर्फ सार्विक मतदान के जरिए सरकार चुन लेने भर की कवायद नहीं है। यदि समाज में सभी को आगे बढ़ने के समान मौके नहीं मिलते या सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक प्रगति के फलों के रसास्वादन का मौका नहीं मिलता, तो लोकतंत्र महज एक साइनबोर्ड भर रह जाएगा। चूंकि मीडिया की भूमिका लोकतंत्र के स्वास्थ्य की निगरानी रखने वाले डॉक्टर की है, इसलिए इसके पथभ्रष्ट होने के दुष्परिणामों का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।
भारत में नगरीकरण शास्त्रीय संदर्भ में आधुनिक चेतना का वाहक नहीं बना। चूंकि हमारे देश में लोकतंत्र का नागरिक चेतना से खास वास्ता नहीं है, शिक्षा व सूचना से वंचित गांवों में इसने पारंपरिक सामुदायिक जीवन को नष्ट कर हिंसक  धडे़बंदियों को जन्म दिया है। हाल फिलहाल बाजार अर्थव्यवस्था के गांवों तक पहुंचने के बाद से उपभोक्तावाद व अश्लील संस्कृति ने गांवों की बदसूरती की रही-सही कसर भी पूरी कर दी। ऐसे में मीडिया का रोल खासकर टीवी पत्रकारिता का और भी अहम हो जाता है क्योंकि किसी भी देश की तरक्की का रास्ता खेती-किसानी से ही होकर गुजरता है और एक स्वस्थ देश के निर्माण में वहां के युवाओं की भूमिका महती होती है।




Tuesday, 10 September 2013

सियासत का खेल




सियासत को लहू पीने की लत है,

वरना मुल्क में सब खैरियत है।

मुजफ्फरनगर हिंसा की चपेट में है और आधा सैकड़ा लोगों की जान जाने के बाद भी नफरत की भड़की इस आग में राजनेता रोटियां सेकने से बाज नहीं आ रहे। आएं भी क्यों, उन्हें लगता है कि सत्ता का रास्ता इन्हीं गलियारों से होकर जाता है। लोहिया का समाजवाद क्या यही था या राम ने ऐसे रामराज की कल्पना कभी की होगी। उत्तर हर पढ़ा लिखा और अनपढ़ आदमी भी दे सकता है लेकिन वह संगठित नहीं है इसलिए उसके एकल विचार की कोई एहमियत नहीं और न ही कभी तवज्जो दी जाती है।

मुजफ्फनगर की इस सांप्रदायिक हिंसा की खूब चीरफाड़ होगी। एक से बढ़कर एक सामाजिक, राजनीतिक विश्लेषक समीक्षा करेंगे लेकिन हकीकत के धरातल पर असली समीक्षा उन्हें ही करनी है जिनको वहां रहना है। खेती करनी है या खेती से अपने घर बनाने सवारने हैं। ऐसे समाज में घूम रहे वोट के भूखे भेड़ियों से बचना अब उस हर शख्स का काम है जो जयश्रीराम के नारों के साथ तलवारें म्यान से निकालते हैं या फिर अल्लाह के नाम पर खंजरों की धार तेज करते हैं।

इतिहास गवाह है कि जब-जब इस गंगा-जमुनी तहजीब पर किसी की बुरी नजर पड़ी तब-तब इस इलाके में रहने वाले सभी मजहब के लोगों ने उस चुनौती को अपनी माटी की अस्मिता से जोड़कर उसका मुकाबला किया।

कितना भी बड़ा मुकदमा गांव की पंचायत में बेहद शालीनता के साथ निबटा लिया गया। रामकिशन ने खुद चंदा देकर मस्जिद बनवाने में योगदान किया तो आसिफ मियां ने कन्नी लेकर मंदिर की नींव में उसी शिद्दत के साथ योगदान किया। तो नफरत आई कहां से। स्वाभाविक है इसके उत्तर खुद ही तलाशने होंगे।

अब न वो पंचायतें रहीं ओर न ही वे हुक्मरान जो कौमी एकता की मिसाल बनते थे। पंच भी घर से ही एक पक्षीय फैसला करके पंचायतों में जाने लगे तो ऐसी पंचायतों का ही अस्तित्व अंतिम सांस ले रहा है। इस बात की चिंता स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत को भी थी। अक्सर उनके साथ काफी लंबी-लंबी गुफ्तगू हो जाती थी तो इस बात पर वह काफी असहज और चिंतिक दिखते थे। कहते थे कि इसीलिए समाज का पतन हो रहा है और चरित्र गिर रहा है। और जिस समाज का चारित्रिक पतन होने लगता है तो ऐसे कौमें इतिहास में ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह पातीं इसीलिए इनको जोड़ने की कोशिश होती रहनी चाहिए। यही राजनीतिक दलों की स्थिति है।

मुजफ्फनगर की घटना में आपको ये सभी तत्व मिल जाएंगे। कवाल में हुई घटना आक्रोश का परिणाम थी लेकिन उसको हवा देने का काम किया सबसे पहले प्रशासन ने उसके बाद हिन्दू संगठनों ने और इसका राजनीतिक लाभ लेने का गणित भिड़ाया सपा ने। इस त्रिशंकुषड़यंत्र के बीच जिसके दो बेटे मारे गए उस बाप की चीत्कार पंचायत के मंच के शोर में कहीं गुम हो गई और वोटों के धु्रवीकरण का शंखनाद हावी होता चला गया।

कुछ सवाल यहां और भी खड़े हो रहे हैं। माना जाता है कि समाज का सबसे तीव्र बुद्धि वाला तबका होता है जो प्रशासनिक व्यवस्था को संचालित करता है। लेकिन प्रशासनिक अधिकारी भी पार्टीबंदी में उलझकर रह गए हैं। देश की अस्मिता, सार्वभौमिकता और अखण्डता को बचाए रखने की कसम खाने वाला यह प्रशासनिक अमला अधिकांशतया ऐसे नेताओं के तलवे चाटता दिखाई दे रहा है जिनकी न कोई विचारधारा है और न ही कोई जमीर। इनमें से कोई हिन्दू के नाम पर समाज में विष घोल रहा है कोई जाति के नाम पर। अब तो गोत्र तक लोग उतर आए हैं।

सभी कहते नहीं अघाते कि देश या प्रदेश बर्बादी की कगार पर है। उनसे पूछो कि समस्या का हल क्या है तो तपाक से कहते हैं कि हमारे धर्म या जाति का नेता सीएम या पीएम बने तो समस्या खत्म।

सवाल ये उठता है कि इस सोच को पैदा ही क्यों होने दिया गया। इसके लिए देश की आजादी के बाद के लोगों को दोष के कटघरे में खड़े किया जाए या फिर उससे पहले के अलंबरदारों को या उससे भी पहले के, जब से समाज अस्तित्व में आया। सवाल का जवाब मिलना बेहद कठिन है।

जब कोई मजहब आपस में बैर करना सिखाता ही नहीं है तो ऐसे लोगों को राक्षस या जिन्नात की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए जो बैर करना सिखा ही नहीं रहे बल्कि उसके लिए मजबूर कर रहे हैं।

मैं फिर मुजफ्फनगर की घटना पर ही आ रहा हूं। प्रशासन ने आधा सैकड़ा लोगों के शवों को देख अपनी आत्मा की आवाज सुनी और जिन लोगों को शुरुआती दौर में नामजद किया गया था उनको निर्दोष करार दिया। यही एकमात्र लोगों की मांग भी थी लेकिन यह सब तब किया गया जब दो कौमों के बीच नफरत की खाई को इतना चौड़ा होने का मौका मिला जिसको भरने में दशक बीत जाएंगे।

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने रामजन्म भूमि विवाद से भड़की इन दोनों समुदाय के बीच की नफरत को भोपा में 8 अगस्त 1989 को पाटने का ही काम नहीं किया बल्कि आपसी भाईचारे की नींव को दशकों तक इतना मजबूत रखा, कि इस दौरान बड़े से बड़ा सांप्रदायिक हवा का झोंका उसका बाल भी बांका नहीं कर सका। इस विरासत को उन्होंने जिनको सौंपा वह भी लाख कोशिशों के बाद इस झोंके को नहीं रोक पाए। अब देखना ये है कि इस कौमी एकता की नींव के पत्थर कौन-कौन साबित होंगे, इसका मुझे भी बेसब्री से इंतजार रहेगा। इसलिए सही कहा गया है-

लोग टूट जाते हैं एक घर बसाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलवाने में..।



Wednesday, 27 August 2008

परमाणु करार भारत की जनता के साथ छलावा





परमाणु अप्रसार संधि को लेकर देश में अभी भी बेहद अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। इस मुद्दे पर भले ही वामपंथियों ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया है लेकिन कांग्रेस किसी भी कीमत पर इस संधि की पक्षधर है और इसके लिए वह हर बाधा को पार करने के लिए आतुर दिख रही है। एक तबका विकास के लिए परमाणु करार का हितैषी है तो एक बड़ा हिस्‍सा इसके दुष्‍परिणाम से विचलित। आखिर वामपंथी विरोध के पीछे का तर्कशास्‍त्र क्‍या है और क्‍या वाकई परमाणु ऊर्जा ही विकास का एकमात्र साधन बचा है या फिर और भी कोई रास्‍ता है। यदि कांग्रेस सरकार हर हालत में समझौता कर लेती है तो फिर देश और बाहर के राजनीतिक हालात क्‍या होंगे। इस परमाणु डील के दूरगामी परिणाम क्‍या होंगे और वह कौन सा मॉडल है जिसे वामपंथी चाहते हैं। इन्‍हीं मुद़दों पर तेज तर्रार कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के युवा नेता अतुल अंजान से विस्‍तृत बातचीत कर परमाणु करार पर हो रही रार के बारे में जानने की कोशिश की गई।

1: ऊर्जा उत्‍पादन का सीधा रिश्‍ता विकास से है। किसी एक स्रोत से हमें पर्याप्‍त ऊर्जा नहीं मिल सकती। प्रदूषण नियंत्रण और ग्‍लोबल वार्मिंग में कटौती के मद़देनजर परमाणु ऊर्जा का उपयोग जरूरी बताया जाता है। ऐसे में अगर भारत को अपनी मौजूदा औद्योगिक रफ्तार बनाए रखनी है तो उसे परमाणु ऊर्जा को अपनाना पड़ेगा। क्‍या आप विकास के लिए परमाणु ऊर्जा को जरूरी समझते हैं ?

1: विज्ञान और तकनीक के बढ़ते दायरे के चलते ऊर्जा की जरूरत से कोई समझदार व्‍यक्ति इंकार नहीं कर सकता। लेकिन ऊर्जा के उत्‍पादन के स्रोतों के संबंध में विश्‍वव्‍यापी बहस चल रही है। जिस आणविक ऊर्जा की बात अमेरिका व यूरोप के लोग तीसरी दुनिया के देशों को प्रस्‍तावित कर रहे हैं उसी ऊर्जा के उत्‍पादन की प्रक्रिया से उत्‍पन्‍न कुप्रभाव पर गहरी बहस यूरोप के पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और साधारण नागरिकों में चल रही है। शायद इसीलिए दुनिया के सर्वाधिक ऊर्जा के विभिन्‍न स्रोतों का इस्‍तेमाल करने वाले अमेरिका में तेल व गैस का भरपूर दोहन किया जा रहा है और बीस वर्षों से अमेरिका में कोई नए आणविक ऊर्जा केंद्र स्‍थापित नहीं किए गए। फ्रांस एकमात्र यूरोप का अकेला देश है जहां साठ फीसदी से अधिक ऊर्जा का स्रोत आणविक ऊर्जा है। और वहां आणविक प्रयोगों से उत्‍पन्‍न होने वाले दुष्‍प्रभावों को सोचकर फ्रांसीसी जनता का एक बड़ा हिस्‍सा ऊर्जा के लिए गैर आणविक स्रोतों 'सोलर एनर्जी' के प्रयोगों पर अपनी सरकारों पर बल दे रहा है।


2: परमाणु ऊर्जा तक पहुंचने का रास्‍ता अमेरिका से होकर गुजरता है। एनपीटी पर हस्‍ताक्षर किए बिना कोई देश हमारे साथ परमाणु सहयोग को तैयार नहीं होगा। अलबत्‍ता अमेरिका अपने करार के जरिए ऐसा करने को तैयार है। लेकिन भारत में वामपंथी दल अमेरिका से परमाणु करार के विरोधी हैं। इस विरोध का मतलब परमाणु ऊर्जा की राह को हमेशा के लिए बंद करने जैसा नहीं?

2: अमेरिका द्वारा प्रतिपादित साम्राज्‍यवादी विस्‍तार के ऊपर आधारित परमाणु अप्रसार संधि का दस्‍तावेज एनपीटी तीसरी दुनिया के देशों के लिए भेदभावपूर्ण ही नहीं वरन अपनी सैन्‍य शक्ति के आधार पर दादागिरी दिखाने का दस्‍तावेज है। इसीलिए संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में बोलते हुए तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एनपीटी पर भारत की ओर से हस्‍ताक्षर करने से इंकार किया था। उन्‍होंने अमेरिका से परमाणु प्रसार व परीक्षण पर 'ऊर्जा एवं सैन्‍य आवश्‍यकताओं सहित' रोक लगाने के लिए विश्‍व बिरादरी को आश्‍वस्‍त करने की मांग की थी और उनका यह दृष्टिकोण तीसरी दुनिया के देशों ने स्‍वीकार किया था जो आज भी प्रासंगिक है, और यही 'राजीव गांधी डॉक्‍टराइन' कहलाती है।
किसी देश के लिए उसकी आंतरिक, सामाजिक, विकासशील, वैज्ञानिक एवं स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए परमाणु परीक्षण पर रोक लगाने या उसकी निगरानी करने के लिए अमेरिका व उसके सहयोगी साम्राज्‍यवादी देशों को निर्धारण करने का अंतिम फैसला करने का अधिकार कैसे प्राप्‍त हो जाता है। उन्‍हें किसने खलीफा बना दिया। दुनिया शांतिपूर्ण रहे, तनावमुक्‍त रहे, यह तो सभी देशों के जनगण की इच्‍छा है। अकेले अमेरिका व उसके सहयोगी देश मानवता के स्‍वघोषित पहरेदार कैसे बन सकते हैं। दुनिया में सबसे ज्‍यादा प्रदूषण फैलाने वाला, माहौल को गर्म करने वाला, प्रकृति के सामंजस्‍य को विचलित करने वाला और जनतंत्र की आड़ में देशों पर सैन्‍य हमला करने वाला अमेरिका सबसे ज्‍यादा कार्बन पैदा कर रहा है।
जब संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ के तत्‍वावधान में मानवता को बचाने व प्राकृतिक माहौल को बेहतर बनाने, नदियों व पहाड़ों को सुरक्षित रखते हुए वायुमंडल को परिष्‍कृत करने के लिए और विश्‍व की खाद्य सुरक्षा को बरकरार रखने के लिए, कृषि उत्‍पादन पर नकारात्‍मक प्रभावों को रोकने के लिए दुनिया के 140 देश जापान में इकट्ठा होकर 'क्‍योटो प्रोटोकाल' का मसविदा तैयार करते हैं तो अमेरिका व उसके सहयोगी देश उस पर हस्‍ताक्षर करने से मना कर देते हैं। उनका कहना है कि 'क्‍योटो प्रोटोकाल' से अमेरिका का विकास बाधित हो जाएगा। अपने निजी देशीय स्‍वार्थ के लिए अत्‍यधिक कार्बन उत्‍सर्जन कर दुनिया व वायुमंडल को प्रदूषित होने से बचाने के लिए क्‍या अमेरिका की सरकार नैतिक रूप से जिम्‍मेदार नहीं है। लाखों टन घातक बमों से अफगानिस्‍तान व इराक पर हमला कर अमेरिका ने मध्‍य एशिया, खाड़ी देशों सहित भारत के वातावरण को गर्म माहौल में तब्‍दील कर दिया है। इसके लक्षण भारत की जलवायु पर साफ दिखाई दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के 110 करोड़ लोगों का चिंतित होना स्‍वाभाविक है और भारत के वामपंथ सहित संवेदनशील लोग अमेरिका से पूछ रहे हैं कि इस अन्‍याय के विरूद्व विरोध प्रकट करना क्‍या मानवता को बचाने की लड़ाई का हिस्‍सा नहीं है।

भारतीय वामपंथ और उसकी प्रतिनिधि कम्‍युनिस्‍ट पार्टी अमेरिकी जनता की विरोधी नहीं है बल्कि अमेरिकी सरकार की साम्राज्‍यवादी, विस्‍तारवादी एवं अंतरराष्‍ट्रीय वित्‍तीय पूंजी हमलावर नीतियों की विरोधी हैं। हमें याद रखना चाहिए कि अमेरिकी जनता भी साम्राज्‍यवादी, विस्‍तारवादी अपनी सरकार की नीतियों के खिलाफ उठकर खड़ी होती है।

तीन चार वर्ष पूर्व 10 लाख अमेरिकी नर-नारियों ने वाशिंगटन व न्‍यूयार्क में प्रदर्शन कर मांग की थी कि दुनिया के अत्‍यंत पिछड़े देशों के ऊपर अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष व विश्‍व बैंक के लदे कर्जे माफ कर दिए जाने चाहिए। क्‍या अमेरिका के राष्‍ट्रपति ने चाहें वह किसी भी दल के हों अपनी ही जनता की इस तर्क पूर्ण, न्‍यायपूर्ण मांग स्‍वीकार- नहीं। यह वह प्रश्‍न हैं जिन पर ध्‍यान देना जरूरी है।



3: क्‍या भारत को परमाणु अप्रसार संधि में हस्‍ताक्षर करने चाहिए? यदि नहीं तो आपकी नजर में भारत के लिए परमाणु हथियार के विकल्‍प को खुला रखने की व्‍यावहारिक जरूरत क्‍या है

3 भारत को किसी भी स्‍तर पर गैर-बराबरी पर आधारित संधि पर हस्‍ताक्षर नहीं करने चाहिए। तनाव रहित, शांतिपूर्ण, सह'अस्तित्‍व पर आधारित तथा संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ के मानवाधिकारों पर आधारित विश्‍व स्‍थापना की ओर आगे बढ़ने को यह जरूरी है कि परमाणु संपन्‍न अमेरिका सहित पी-5 देश भविष्‍य में किसी भी प्रकार के परमाणु परीक्षण पर एकतरफा रोक की घोषणा करें। परमाणु सैनिक उपकरण के निर्माण पर तत्‍काल रोक लगाएं और परमाणु हथियारों को शनै: शनै: समाप्‍त करने की दिशा में आगे बढ़ें। अगर यह ऐलान होता है कि भारत को‍ विश्‍व के अन्‍य देशों के साथ मिलकर परमाणु अप्रसार संधि पर हस्‍ताक्षर कर देने चाहिए। ऐसा नहीं होता तो यह कैसे मान लिया जाए कि भारत दुनिया पर दादागिरी कायम करने के लिए परमाणु सैन्‍य शक्ति का विकल्‍प खुला रखकर कुछ अनहोनी कर देगा।

भारत ने आज तक किसी देश पर हमला नहीं किया। अमेरिका ने तो पचासों देशों में एकतरफा सैन्‍य दखलंदाजी की, परमाणु हथियार चलाए। लाखों लोगों को मारा और इसके बावजूद भी वह विवेकवान परमाणु शक्ति देश होने का गौरव हासिल करने के लिए बेशर्मी से विश्‍व बिरदारी के सामने खड़ा हो जाता है। इन तथ्‍यों को रखने से सत्‍य की जांच हो जाती है। मात्र अमेरिकी विरोध मेरा मकसद नहीं।


4: आज दुनिया को देखें तो सामाजिक-आर्थिक स्‍तर पर विकास के एक ही 'बाजार केंद्रित, अमेरिकी' मॉडल का बोलबाला है। भारत भी उसी राह पर चलता दिखाई देता है। इस मॉडल से जो संस्‍कृति निकलती है, उसके मुताबिक धरती के सारे संसाधन मनुष्‍य के लिए हैं और मनुष्‍य की भूख की कोई सीमा नजर नहीं आती है। क्‍या प्राकृतिक संसाधनों के 'प्रति व्‍यक्ति' इस्‍तेमाल की कोई सीमा होनी चाहिए। उपभोक्‍तावाद की वर्तमान दशा को देखते हुए क्‍या आपको गांधी की आज के संदर्भ में कोई राजनीति की सार्थकता महसूस होती है

4 विश्‍व के अधिकांश देशों में भूख गरीबी, अशिक्षा, अत्‍यंत सीमित स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं आज के दौर में साफ दिखाई दे रही हैं तथाकथित शीत युद्व की समाप्ति के बाद ' एक ध्रुवीय विश्‍व' की सोच को लेकर अमेरिका व उसके सहभागी 'ग्‍लोबल विलेज' के लोकलुभावन नारे के तहत बाजारवाद की आड़ में अंतर्राष्‍ट्रीय वित्‍तीय पूंजी को स्‍थापित करने के महाअभियान में जुटे हैं। साम्राज्‍यवादी विचारधारा से लैस अर्थशास्‍त्री अब तीसरी दुनिया के देशों के बाजार पर अपने उत्‍पादित माल का कब्‍जा कराने, उनके जल-जंगल-जमीन सहित प्राकृतिक संसाधनों खदान से लेकर खेती तक हथियाने के लिए नई नीतियां पेश कर रहे हैं। अफ्रीका के देशों के सोना से लेकर मैगजीन तक लूट कर ले जा रही अमेरिका सहित यूरोप की बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां इन देशों के जन-गण को कंगाल बना रही हैं। कंगाली बढ़ाने में साम्राज्‍यवादी देशों का अपनी बहुराष्‍ट्रीय कंपनी और कॉरपोरेट घरानों को कूटनीतिक व राजनीतिक संरक्षण ही नहीं है वरन् उनके हितों की रक्षा के लिए वह सैनिक कार्रवाई भी करती हैं। वहीं दूसरी ओर भूख व अकाल की स्थिति पैदा होने के लिए जिम्‍मेदार होने के बावजूद विश्‍व बिरादरी के सामने अपना मानवीय चेहरा दिखाने के लिए विश्‍व बैंक की ओर से कुछ डॉलर दान में देकर दानदाता का तमगा हासिल करने में जुटे हुए हैं। बीबीसी व सीएनएन व संचार माध्‍यम में यह फोटो भी दिखाए कि अकालग्रस्‍त बच्‍चे व माता को अमेरिकी व यूरोप के डॉक्‍टर कुछ बिस्‍कुट व ओस की बूंदें चटा रहे हैं। एक न्‍ययपरक 'विश्‍वसमाज' एवं 'विश्‍वग्राम' बनाने की दिशा में घृणित कार्रवाई मानवता के साथ अन्‍याय ही नहीं जुगाली भी है।


पूंजीवादी के और आज के दौर के आक्रामक पूंजीवाद के द्वारा मानवीय संवेदनाओं से लैस विश्‍व नागरिक बनाने की दिशा में आ रही प्रलयंकारी नीतियों को बदलना होगा और इसे बदलने की दिशा में बुद्व की करूणा, लिंकन का साहस, मार्क्‍स के वैज्ञानिक समाजवाद, लेनिन की दृढ़ता, मार्टिन लूथर किंग की सामाजिकता और गांधी की अहिंसा व लोककल्‍याण की नीति के विशाल सामंजस्‍य की आवश्‍यकता आज के दौर की प्राथमिकता होनी चाहिए।


5 : भारत और चीन की मौजूदा आर्थिक वृद्धि से कई पश्चिमी अर्थशास्‍त्री चिंतित हैं। उनका तर्क है कि अमेरिका की रहा पर चल रहे इन देशों की आधी आबादी भी वहां के मध्‍यमवर्ग की तरह लगे तो उनकी जरूरतें पूरी करने को दो धरतियां भी कम पड़ेंगी। पृथ्‍वी के प्राकृतिक संसाधनों की सीमितता को देखते हुए उनकी बात में दम दिखाई पड़ता है। आप क्‍या कहेंगे?
5 : एक सभ्‍य विश्‍वग्राम में सिर्फ न्‍यायसंगत होने की गुहार लगाना और मानवीय अधिकारों की चर्चा करने से बात नहीं बनेगी। इस धरती पर समुद्र और इसके नीचे आसमान और वायुमंडल हम सबकी साझी संपत्ति है। विज्ञान और तकनीक की विकसित व्‍यवस्‍था ने देशज सीमाएं तोड़ दी हैं। वायु के प्रभाव पर रोक नहीं लगाई जा सकती, लेकिन अपने देश की सीमा पर खड़े होकर दूसरे देश में जाती वायु को बैक्‍टीरिया से प्रभावित कर उस देश के अंदर जाने वाली हवा से लोगों के जीवन को नारकीय बनाया जा सकता है। मानवता के विकास के इतिहास ने हमें बहुत कुछ सिखा दिया है। तार्किक भी बना दिया है, लेकिन प्राकृतिक संपदाओं का अगर न्‍यायिक वितरण नहीं हुआ तो अशांति बनी ही रहेगी। हम न्‍यायिक ही न हों, बल्कि न्‍याय करते हुए दिखाई भी दें। चीन व भारत आज के दौर में सेवा क्षेत्र के विस्‍तार से चलते विश्‍व विकास की सामान्‍य गति से थोड़ा आगे दिखाई दे रहे हैं। यह भी ध्‍यान देने योग्‍य है कि इन्‍हीं दो देशों में 240 करोड़ की आबादी रहती है, अर्थात आधी विश्‍व आबादी। विकास के कुछ पिरामिड इन देशों में खड़े हुए हैं। अच्‍छी बात है। स्‍वागत योग्‍य है। इन्‍हें साम्राज्‍यवाद लूट-खसोट से आजाद हुए अभी साठ साल ही हुए हैं। दोनों देशों में अलग-अलग तरह का जनतंत्र है। दोनों देश सैकड़ों वर्ष साम्राज्‍यवाद गुलामी में जीते रहे हैं। दोनों देशों में जन-गण-की भावनाओं के आधार पर दो अलग-अलग तरह की सामाजिक क्रांतियां हुईं। आर्थिक रूपांतरण की प्रक्रिया में दोनों ही देशों में कुछ समान और कुछ अपने अनुभवों पर आधारित प्रयोग चल रहे हैं। विकास की दर की तेजी के दौर के बावजूद इन देशों की अस्‍सी फीसदी जनता अभी भी हाशिए पर खड़ी है। आर्थिक विकास की यात्रा में समाज के दस से पन्‍द्रह फीसदी ही लोग सुख-सुविधा संपन्‍न होकर गुजर-बसर करें और बाकी अधिकांश आस और चाह की हसरत में बैठे और खड़े रहें तो यह आर्थिक विकास कितना न्‍यायिक और मानवीय होगा

दोनों देशों के अंदर किसान, मजदूर, ग्रामीण महिला, नौजवानों के बीच काम करने वाली क्रांतिकारी रूपांतरण विचारधारा से लैस लोग अपने-अपने स्‍तर पर व्‍यापक आर्थिक बराबरी के संघर्ष में लगे हैं।


6 देश को 'सुपर पावर' बनाने के भारत के शासक वर्ग के सपने से आप कितना इत्‍तफाक रखते हैं। क्‍या भारत को महाशक्ति बनना चाहिए क्‍या एटमी समझौते से विश्‍व स्‍तर पर भारत की शक्ति और स्‍वायत्‍ता बढ़ेगी या वह अमेरिका की वैश्विक सत्‍ता का एक अंग बन जाएगा

6 भारत अपनी भौगोलिक और जनसंख्‍या की स्थिति से एक ऊर्जावान बड़ी शक्ति है। विश्‍व बंधुत्‍व, प्रेम, सौहार्द, जनतंत्र और शांतिप्रिय विश्‍व की अवधारणा के कारण भारत की आवाज महत्‍व रखती है। सुपरपावर का मेडल लटकाकर हम में एकस्‍ट्रा सुपरपावर बनने की ललक नहीं होनी चाहिए। हाशिए पर पड़े लोगों का बेहतर जीवन स्‍तर बनाने से हमारा जनतंत्र गरिमामय होगा। हम अपने देश को आगे ले जा पाएंगे। दुनिया के अन्‍य देशों के शोषित पीडि़त लोगों को संबल प्रदान करेंगे। उनके जीवन स्‍तर को बेहतर बनाने में योगदान दे सकते हैं। यह कहते हुए हम भारत को 'सुपर ह्यूमन पावर' बना सकते हैं। लेकिन यह आक्रामक पूंजीवादी नीतियों और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की लूट- खसोट की नीतियों पर चलने से नहीं होगा। अपने बाजार लुटेरों के हवाले कर हम अपने किसानों के कटोरों में थोड़े बहुत रखे चावलों को लुटवाने का मार्ग प्रशस्‍त करेंगे। भारत एटमी शक्ति है। दो बार हम परमाणु परीक्षण कर चुके हैं, सारी दुनिया जानती है। भारत शांति व सह-अस्तित्‍व में विश्‍वास रखने वाला अपनी गतिविधियों से विश्‍व बिरादरी को सबूत देने वाला देश है। भारत की अपनी स्‍वतंत्र गुटनिरपेक्ष विदेश नीति रही है। हम समानता में विश्‍वास रखते हैं। पश्चिम के विचारकों, यूरोप के देशों तथा सबसे अधिक अमेरिका को दुनिया को यह बताना चाहिए कि जब शीतयुद्व समाप्‍त हो गया, सोवियत संघ का विघटन हो गया, ' वारसा पैक्‍ट' से देशों की सैन्‍य कमान विघटित हो गई तो 'नाटो' का विस्‍तार क्‍यों हो रहा है। कम्‍युनिस्‍टों का हौवा खड़ा करके अमेरिका व उसके सहयोगियों ने नाटों का गठन किया था और जवाब में सोवियत संघ ने वारसा पैक्‍ट बनाया था। आज नाटों को किससे खतरा है। सोवियत संघ तो रहा नहीं। आज नाटों में लगभग बाइस देशों से बढ़ाकर चालीस देशों को उसका हिस्‍सा बना लिया गया। क्‍या इन देशों की सेनाओं के संगठन नाटो को इसलिए बढ़ाया व चलाया जा रहा है कि तीसरी दुनिया के देशों के हीरे व सोने के खान, लोहा, अभ्रक व एल्‍युमीनियम के खदान, इनकी जमीन व इन देशों के समुद्र पर आने वाले समय में कब्‍जा किया जाए। इनके प्राकृतिक तेल व गैस पर 'बलात्' कब्‍जा कर लिया जाए। अमेरिका व ब्रिटेन ने इसी इरादे से इराक को हथिया लिया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्‍व में एनडीए की सरकार के जमाने में अमेरिका ने यहां तक प्रस्‍ताव दे दिया कि भारतीय फौज इराक में अमेरिका के साथ मिलकर लड़ें। कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने देशभर में व्‍यापक आंदोलन खड़ा किया और आखिरकार भारत की सरकार को इस प्रस्‍ताव से पीछे हटना पड़ा।

भारत-अमेरिकी परमाणु करार कहीं से भी भारतीय हित में नहीं है। इस करार के बाद सन् 2020 तक कहा जा रहा है कि भारत बीस हजार मेगावाट आणविक बिजली पैदा करेगा। वर्तमान में एक लाख चालीस हजार मेगावाट बिजली पैदा हो रही है। इसमें से मात्र चार हजार मेगावाट यानी तीन फीसदी आणविक ऊर्जा है। सन् 2020 तक भारत आठ लाख मेगावाट बिजली पैदा करेगा। यह ऊर्जा थर्मल, हाइड्रो व गैर पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्र से आएगी। बीस हजार मेगवाट आणविक ऊर्जा सन् 2020 में संपूर्ण ऊर्जा का मात्र पांच फीसदी ही होगी।

आठ लाख हेक्‍टेयर खेती योग्‍य जमीन इन संयंत्रों में लगेगी। इसके लिए 11 लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। आणविक ऊर्जा केंद्रों के तीन मील के दायरों से गांव हटाए जाएंगे। यानी खेती भी नहीं होगी और जमीन बांझ हो जाएगी। 11 लाख करोड़ रुपए कौन देगा- विश्‍व बैंक। वह भी ऊंची ब्‍याज दर पर। दस मिलियन डॉलर के अमेरिका में बेकार पड़े रियेक्‍टर भारत को बेचे जाएंगे। रिएक्‍टर की आमदनी, विश्‍व बैंक की आमदनी, अमेरिका की आमदनी एक अच्‍छा व्‍यापार है।

आठ लाख हेक्‍टेयर जमीन खेती से हट जाएगी, खाद्यान्‍न की कमी होगी, खाद्य सुरक्षा भारत को प्रभावित होगी, फलस्‍वरूप भारत को अमेरिका से गेहूं मंगाना होगा। इस तरह से हम भरेंगे अमेरिका का खजाना। भारत का आणविक कचरा सुरक्षित फेंकने के लिए हर वर्ष तीन अरब डॉलर खर्च करने होंगे। आखिर कचरा फेकेंगे कहां। बर्मा में, नेपाल में, भूटान में, श्रीलंका या राजस्‍थान के रेत में। वास्‍तविकता में इस परमाणु‍ संधि के द्वारा हाईडेक्‍ट-123 के द्वारा हमारी स्‍वतंत्र विदेश नीति को अमेरीकी की विदेश नीति के साथ गुत्‍थमगुत्‍था कर भारत को अमेरिका की विदेश नीति का हिस्‍सा बनाना है।

7: अगर नाभकीय समझौता यूपीए सरकार कर लेती है तो देश के भीतर और बाहर राजनीतिक स्थिति क्‍या होगी।

हमने यह पहले ही स्‍पष्‍ट कर दिया था कि यदि यूपीए सरकार इस दिशा में कोई कदम बढ़ाती है तो वो हमारा समर्थन खो देगी और हुआ भी ऐसा ही। लेकिन हम अपने प्रयास में सफल रहे। सवाल यह भी जायज है कि वामपंथियों में इसमें इतनी देर क्‍यों की इसका सीधा सा जवाब यह है कि हम देश के भीतर इस मुद्दे पर एक बहस खड़ी करना चाहते थे। जिसमें हमें कामयाबी मिली। चाहे वह संसद हो या जनता दरबार हमने इस संधि के सभी पहलूओं को बेबाकी से रखा।